aadarsh

सच का सफर

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मै नहीं जानता...माँ तू ही बता आज यह

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मां मै नहीं जानता … तुझसे कहां कमी हुई
खुद सोकर जमीं पर हर ख्वाब तूने पूरे किए
मै नहीं जानता मां तू ही बता आज यह ..
कि जानवर बनकर इंसान ने ये क्या किया…?
तेरे दूध के कर्ज को कैसा ये चुकता किया..
..कि हैवानियत ने भी यहां शर्म का चोला ओढ़ लिया
आज तू बता मुझे…न जाने दूंगा मै तुझे…
कैसा ये दोहरा रूप है … कैसी ये दोहरी बात है
इंसानियत की भी सुबह और अंधेरी रात है ..
संस्कारों की लौ आज देखो … कैसे बनी राख है
मै नहीं जानता … मां तू ही बता आज यह
मै नहीं …… …… …….. …….. आज यह ।।
तेरी फटी धोती को तो … जोड़ने की कसम थी यह
चीख सुनकर भी तुझे न याद आयी ये कसम
बेटी थी वो एक बाप की … लाठी थी एक परिवार की
कैसे करूं खुद पर यकीं आज लौ है वो इंसाफ की ।
टूटती रहेंगी तब तक … ये लाठियां परिवार की …
गुमनामियों मे डूबी है जब तक आवाज हिंदुस्तान की
सम्मान के इतिहास में … कैसा ये काला दाग है …
मै नहीं जानता … मां तू ही बता आज यह …
मै नहीं जानता मां तू ही बता आज यह …??

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

nishamittal के द्वारा
January 3, 2013

बहुत भावपूर्ण मार्मिक रचना कैसा ये दोहरा रूप है … कैसी ये दोहरी बात है इंसानियत की भी सुबह और अंधेरी रात है .. संस्कारों की लौ आज देखो … कैसे बनी राख है मै नहीं जानता … मां तू ही बता आज यह मै नहीं …… …… …….. …….. आज यह ।।

    RAHUL YADAV के द्वारा
    January 3, 2013

    धन्यवाद …


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